----------------------------------------------------------------------आयुष कुमार
पैर पटकता नन्हा अंकुर,
जब आंख उसने खोली है,
उसे जन्म है दिया किसने
ये सवाल उसकी प्यारी है,
क्या जाने वो नन्ही जान,
ये जवाब कितनी भारी है।
जिसे दुनिया करती नफ़रत है,
कोई और नहीं वो नारी है।
अपने खुशियों से मुंंह मोड़ के,
सारे बंधन को झेली है,
रीति रिवाजों के चक्कर मे,
समाज ने उससे खेली है,
आधे अधिकारो के बाद भी,
जिसने हंसना ना छोड़ी है,
ये बात अब सुनलो तुम भी,
कोई ओर नहीं वो नारी है।
क्यों बात है भूला लोगों ने,
जब देश पे आई शामत थी,
कंधा से कंधा मिला मर्दो के,
जो अंग्रेजों पर भारी थी,
थी लड़ी वो खूब मर्दानी,
उसकी बलिदान रंग लाई है,
दिया जिसने ये लोक्य तोहफा है,
कोई और नहीं वो नारी है।
कोई और नहीं वो नारी है।।
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------- সঞ্জয় ঘোষ কেয়া পাতার নৌকো ভাসে, ছোট্টো বোনের রাখির সাথে, অপেক্ষার নদী প্রবাহে বয় ভাইফোঁটা তার স্মৃতিতে রয়। কেয়া পাতার সেই নৌকো ভাসে, পদ্মা নদীর প্রবাহের সাথে, কাঁটাতাঁরের সেই সাজানো ফাঁকে, মাঝির ভাঁটিয়ালি গান বাজে। বঙ্গভঙ্গ হোক না যতই, এমন কাঁটাতাঁর তৈরি কতই, রাখিবন্ধন, ভাইফোঁটাতে এমন নৌকো ভাসবে ততই। কেয়া পাতার সেই নৌকো থামে পদ্মা নদীর ওপার গ্রামে, দাদার হাতে ঐ রাখি সাজে, শঙ্খের নিনাদ সারা বাংল...
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